टेस्ट ने छीना रेस्ट हमारा

22 03 2007

हर मंडे को टेस्ट हमारा, छिना इस ने रेस्ट हमारा।

संडे को हम पढ़ते रहते, दस-दस घंटे रटते रहते।

खेल हे हमसे कोसों दुर, घर पर रहने को हें मजबुर,

मुश्किल से तो संडे आता, उस दिन भी तो टेस्ट रुलाता।

हम से अच्छा भाई मानव, देखे टि.वी बन कर दानव।

साल में उसकी दो ही परीक्षा, शाम को खेले संग समीक्षा

हरदम तो वह मोज मनाए, ताजा हो कर स्कुल वह जाए।

 

टेस्ट ने ली खुशी हमारी, कोई समझे व्यथा हमारी।

कोन हमें मुक्ति दिलवाए, इस झंझट से हमें चाए।

 

(चंपक में छपि कविता में मेरे द्वारा किये कुछ बदलावों के साथ)





मैं हूं मानसी

19 03 2007

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मैं हूं मानसी भाटिया। मेरी आठवीं की परीक्षाएं समाप्त हुई हैं। बीस दिन की छुट्टियां मिली हैं। एग्जाम्स के दिन बहुत तनाव से बीते हैं। अब मैंने भी अपना ब्लॉग बनाया है। यह समझिये कि वर्डप्रैस पर एक बीज बोया है। इन छुट्टियों में इस बीज की देखभाल की जायेगी। आगे फिर गर्मियों की छुट्टियां भी आयेंगी। मेरे स्कूल में तो किसी बच्चे को शायद ही पता हो कि ब्लॉग क्या होता है। मैं उन सब को अपने ब्लॉग के बारे में बताऊंगी तो उनमें से कई शायद बहुत हैरान होंगे।








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