टेस्ट ने छीना रेस्ट हमारा

22 03 2007

हर मंडे को टेस्ट हमारा, छिना इस ने रेस्ट हमारा।

संडे को हम पढ़ते रहते, दस-दस घंटे रटते रहते।

खेल हे हमसे कोसों दुर, घर पर रहने को हें मजबुर,

मुश्किल से तो संडे आता, उस दिन भी तो टेस्ट रुलाता।

हम से अच्छा भाई मानव, देखे टि.वी बन कर दानव।

साल में उसकी दो ही परीक्षा, शाम को खेले संग समीक्षा

हरदम तो वह मोज मनाए, ताजा हो कर स्कुल वह जाए।

 

टेस्ट ने ली खुशी हमारी, कोई समझे व्यथा हमारी।

कोन हमें मुक्ति दिलवाए, इस झंझट से हमें चाए।

 

(चंपक में छपि कविता में मेरे द्वारा किये कुछ बदलावों के साथ)


Actions

Information

12 responses

22 03 2007
संजय बेंगाणी

“देखे टि.वी बन कर दानव।” :) :)

ऐसा लिखोगी तो झगड़ा तय है. और ये समिक्षा कौन है? :)

22 03 2007
राम चन्द्र मिश्र

अच्छा लिखा मानसी,
शीर्षक मे ‘टेस्ट ने छीना रेस्ट हमारा’ या ‘टेस्ट से छिना रेस्ट हमारा’ होता तो और अच्छा लगता।

22 03 2007
समीर लाल

:) ये टेस्ट तो बहुत परेशान कर रहा है इतनी सी बिटिया को. पापा से कह कर मानव के स्कूल में ही आप भी एडमिशन ले लो.. :) कविता में अच्छी तरह मजेदार बात कही है.

22 03 2007
SHUAIB

बहुत ख़ूब – अच्छा लगा पढ कर

22 03 2007
Shrish

बहुत खूब जरुर पापा की तरह लोकप्रिय चिट्ठाकार बनोगी आप।

22 03 2007
अभय तिवारी

कविता अच्छी है.. पर तुम अपने मन से कुछ भी लिखो अपने मन की बात.. कोई ज़रूरी नहीं कि उसमें कविता जैसी तुक हो या न हो.. बस तुम्हारे दिल की बात होनी चाहिये.. तुम बस दिल से कहो.. सबके दिल को फ़टाक से समझ में आ जायेगी.. और सब कहेंगे वाह.. पूछो अपने दिल से .. छिपी है क्या बात उसमें..?

23 03 2007
अनूप शुक्ला

बहुत अच्छे। और लिखो कवितायें। आज तो तुम् भी मैच देखोगी न्! और हां, अब अपने मन से लिखा करो जैसा अभय जी ने कहा!

27 03 2007
Mohinder Kumar

सिर्फ रेस्ट ही नहीं सब कुछ छीन लिया……लुट पिट के वापस आना पडा शेरों को गीदड बन कर

2 04 2007
puneet bhatia

this is an excellant creation by a small girl, children at this age dont even bother to do something new and she created a lovely story.

best of luck mansi for your future

19 04 2007
ranjana

वाह!! बहुत अच्छे मानसी ….पापा से काम नही हो अपने…उनकी तरह ही छुपी रुसतम हो तुम भी:):)

31 08 2007
Nishikant Tiwari

दिल की कलम से
नाम आसमान पर लिख देंगे कसम से
गिराएंगे मिलकर बिजलियाँ
लिख लेख कविता कहानियाँ
हिन्दी छा जाए ऐसे
दुनियावाले दबालें दाँतो तले उगलियाँ ।
NishikantWorld

16 12 2007
shankar suthar

bahut achha laga . very good mansi

Leave a comment