हर मंडे को टेस्ट हमारा, छिना इस ने रेस्ट हमारा।
संडे को हम पढ़ते रहते, दस-दस घंटे रटते रहते।
खेल हे हमसे कोसों दुर, घर पर रहने को हें मजबुर,
मुश्किल से तो संडे आता, उस दिन भी तो टेस्ट रुलाता।
हम से अच्छा भाई मानव, देखे टि.वी बन कर दानव।
साल में उसकी दो ही परीक्षा, शाम को खेले संग समीक्षा
हरदम तो वह मोज मनाए, ताजा हो कर स्कुल वह जाए।
टेस्ट ने ली खुशी हमारी, कोई न समझे व्यथा हमारी।
कोन हमें मुक्ति दिलवाए, इस झंझट से हमें बचाए।
(चंपक में छपि कविता में मेरे द्वारा किये कुछ बदलावों के साथ)
“देखे टि.वी बन कर दानव।”
ऐसा लिखोगी तो झगड़ा तय है. और ये समिक्षा कौन है?
अच्छा लिखा मानसी,
शीर्षक मे ‘टेस्ट ने छीना रेस्ट हमारा’ या ‘टेस्ट से छिना रेस्ट हमारा’ होता तो और अच्छा लगता।
बहुत ख़ूब – अच्छा लगा पढ कर
बहुत खूब जरुर पापा की तरह लोकप्रिय चिट्ठाकार बनोगी आप।
कविता अच्छी है.. पर तुम अपने मन से कुछ भी लिखो अपने मन की बात.. कोई ज़रूरी नहीं कि उसमें कविता जैसी तुक हो या न हो.. बस तुम्हारे दिल की बात होनी चाहिये.. तुम बस दिल से कहो.. सबके दिल को फ़टाक से समझ में आ जायेगी.. और सब कहेंगे वाह.. पूछो अपने दिल से .. छिपी है क्या बात उसमें..?
बहुत अच्छे। और लिखो कवितायें। आज तो तुम् भी मैच देखोगी न्! और हां, अब अपने मन से लिखा करो जैसा अभय जी ने कहा!
सिर्फ रेस्ट ही नहीं सब कुछ छीन लिया……लुट पिट के वापस आना पडा शेरों को गीदड बन कर
this is an excellant creation by a small girl, children at this age dont even bother to do something new and she created a lovely story.
best of luck mansi for your future
वाह!! बहुत अच्छे मानसी ….पापा से काम नही हो अपने…उनकी तरह ही छुपी रुसतम हो तुम भी:):)
दिल की कलम से
नाम आसमान पर लिख देंगे कसम से
गिराएंगे मिलकर बिजलियाँ
लिख लेख कविता कहानियाँ
हिन्दी छा जाए ऐसे
दुनियावाले दबालें दाँतो तले उगलियाँ ।
NishikantWorld
bahut achha laga . very good mansi